सम्पादकीय: साहित्य के प्रति घटता रुझान

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  • संपादक – स्मिता अभिषेक वशिष्ठ

विषय अत्यन्त गम्भीर एवं सोचनीय यह है, किन्तु इस विषय प प्रकाश डालना जरूरी है, आज हम बात कर रहे हैं. अपने साहित्य की, अपने परोहर की, जिसके प्रति आज की युवा पीढ़ी का रुझान दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है.

वर्तमान परिपेक्ष्य में पेशेवराना दौड़ का हिस्सा बनते जा रहे युवा का साहित्य से कोई लेना देना नहीं है। एक विषय के रूप में पढ़कर अच्छे अंक प्राप्त करने के अलावा भाषा साहित्य को युवा कुछ नहीं मानते। न तो स्कूली स्तर पर इसका संवर्धन हो रहा है और न ही विद्यार्थियों को इसकी आवश्यकता महसूस होती है।

प्रोफेशनल युग में प्रोफेशनल कोर्सों ने साहित्य को हाशिए पर खिसका कर रख दिया है इससे साहित्यकारों में एक दर्द देखने को मिलता है। शहर के साहित्यकार इस बात से बेहद खफा हैं कि न तो सरकार और न ही स्कूल, शिक्षक एवं अभिभावक ही कोशिश करते हैं कि बच्चों में शुरू से ही साहित्य में रुचि पैदा की जाए।

युवाओं में साहित्य के प्रति रुझान बहुत कम हो रहा है। इसकी कई वजह है पहला तो स्कूल कालेजों के स्तर पर साहित्य को बढ़ावा देने व विद्यार्थियों में रुचि पैदा करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए जाते, दूसरी वजह यह है कि टीवी इंटरनेट व सोशल नेटवर्किंग साइटों के जाल में युवा उलझ कर रह गया है और सबसे बड़ी बात की आज का युवा केवल पैसा कमाने की होड़ में उन्हीं विषयों को पढ़ता है जिससे उसे अच्छी नौकरी मिल जाए। हालांकि एक वर्ग अभी भी है जो कि साहित्य लिखना व पढ़ना चाहता है लेकिन उसमें लोगों की संख्या बहुत कम हो गई है। साहित्य पढ़ने से विचारों में गहराई आती है और साहित्य से बेहतर व्यक्तित्व का निर्माण भी होता है लेकिन आज के दौर में इन बातों को युवा दरकिनार कर देता है।

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