July 6, 2022

‘अन्तरराष्ट्रीय माहवारी स्वच्छता दिवस’(28 मई) पर विशेष

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बदल रही है सोच, पीरियड्स अब नहीं रहा बोझ
• ‘साथिया’ केन्द्र में हर माह आती हैं 300 से अधिक किशोरियां
• माहवारी पर खुलकर करती हैं चर्चा और लेती हैं सलाह
• स्वच्छता के आधुनिक तरीकों के इस्तेमाल का भी किशोरियों में बढ़ा है चलन

वाराणसी/संसद वाणी
पीरियड्स या मासिक धर्म अब बोझ नहीं रहा। इसके प्रति सिर्फ किशोरियों, युवतियों की ही नहीं बल्कि समाज की भी सोच बदली है। संकोच के दायरे को तोड़ते हुए किशोरियों ने अब इस विषय पर खुलकर चर्चा करनी शुरू कर दी है। इसका ही नतीजा है कि जिला महिला चिकित्सालय में स्थित ‘साथिया’ क्लीनिक में हर माह लगभग 300 किशोरियां आती हैं । वह अपने पीरियड्स के बारे में निःसंकोच चर्चा करती हैं और जरूरी सलाह लेती हैं। ऐसी ही अन्य किशोरियों, युवतियों को मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता के प्रति और जागरूक करने के लिए 28 मई को ‘अन्तराष्ट्रीय माहवारी स्वच्छता दिवस’ मनाया जाता है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. संदीप चौधरी का कहना है कि ‘एक ऐसा भी दौर था जब किशोरियां, युवतियां मासिक धर्म के बारे में बात करने में भी संकोच करती थीं । पीरियड्स के दौरान होने वाली समस्याओं के बारे में किसी को नहीं बताती थीं । नतीजा होता था कि उन्हें तमाम तरह की बीमारियां घेर लेती थीं । डा. चौधरी कहते है कि सरकार के प्रयासों और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत चलाये जा रहे राष्ट्रीय किशोर स्वस्थ्य कार्यक्रम (आरकेएसके) के सार्थक परिणाम आ रहे हैं। इसका ही नतीजा है कि किशोरियां , युवतियां अब इस मुद्दे पर बेहद संवेदनशील और सजग हैं।
अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी व आरकेएसके के नोडल अधिकारी डा. राजेश प्रसाद कहते हैं- किशोरियों के स्वास्थ्य को लेकर चलाये जा रहे कार्यक्रमों की ही देन है कि उनमें पीरियड्स के प्रति जागरुकता बढ़ी है। वह बताते हैं कि मासिक धर्म के दौरान किशोरियों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए शहरी क्षेत्र के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में भी कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसके तहत कन्या विद्यालयों में जाकर हमारी टीम किशोरियों को इस बारे में जागरुक करने के साथ-साथ उचित सलाह भी देती है। इसके साथ ही जिला महिला चिकित्सालय में अलग से ‘साथिया’ केन्द्र का भी संचालन किया जा रहा है।
साथिया केन्द्र की काउंसलर सारिका चौरसिया बताती हैं कि उनके केन्द्र में हर माह 300 से अधिक किशोरियां आती हैं। वह बेझिझक अपनी समस्याओं को हमें बताती हैं । हालांकि कुछ ऐसी भी होती हैं जो शुरू-शुरू में अपनी मां अथवा परिवार की किसी महिला सदस्य के साथ आती हैं। ऐसी किशोरियां शुरू में बात करने में थोड़ा संकोच करती हैं लेकिन जब उन्हें यह समझाया जाता है कि संकोच कर यदि वह अपनी समस्या के बारे में खुल कर नहीं बतायेंगी तो उनका सही उपचार नहीं हो सकेगा और यह उनके लिए घातक होगा। तब वह अपना संकोच त्याग कर अपनी समस्या पर खुलकर बात करती हैं। फिर उनकी समस्याओं को जानने के बाद उन्हें उचित सलाह दी जाती है। साथिया केन्द्र की सारिका चौरसिया बताती हैं कि जिला महिला चिकित्सालय में यह केन्द्र वर्ष 2015 से चल रहा है। इसमें सलाह लेने के लिए आने वाली किशोरियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। मतलब साफ है कि मासिक धर्म जैसे गंभीर मुद्दे पर किशोरियां अब बेझिझक चर्चा कर रही हैं। नेशनल फेमली हेल्थ सर्वे -5 (2019 -21) की रिपोर्ट पर नजर डालें तो पर पता चलेगा कि मासिक धर्म के मामले में जिले में किशोरियां/युवतियों में किस तरह जागरुकता आयी है। एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट के अनुसार 15 से 24 वर्ष की 85.6 प्रतिशत किशोरियां/युवतियां पीरियड्स के दौरान स्वच्छता के आधुनिक तरीकों का प्रयोग कर रही हैं जबकि एन एफएचएस-4 (2015-16) की रिपोर्ट में यह महज 69.1 प्रतिशत ही रहा।

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