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Thursday, December 1, 2022

180 करोड़ वर्ष पुराने पत्थरों को संरक्षित करने में जुटा प्रशासनिक अमला

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मुर्धवा नाले की चट्टानों के महत्व को दर्शाता बोर्ड लगा राज्यमंत्री एवं दुद्धी विधायक ने किया उद्घाटन

रेणुकूट/संसद वाणी

म्योरपुर विकास खंड के मुर्धवा और रनटोला में 180 करोड़ वर्ष पुराने समुद्र की तलहटी चट्टानों के मिलने के दावे के बाद प्रशासनिक अमला इसे संरक्षित करने की कवायद में जुट गया है। वन विभाग द्वारा चिन्हित कर इलाके में विशेष निगरानी किया जा रहा है। वन विभाग की पहल पर गुरुवार को उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री संजीव गोंड़ एवं दुद्धी विधायक राम दुलार गोंड़ ने मुर्धवा नाले के समीप विभाग द्वारा लगाए गए बोर्ड का फीता काटकर उद्घाटन किया साथ ही विशेष चट्टानों का अवलोकन किया।
हाल ही में बीएचयू सहित देश विदेश के नामी-गिरामी भू वैज्ञानिकों के 65 सदस्यीय दल ने इलाके का दौरा किया था। अपने गहन अध्ययन के दौरान पाया कि मुर्धवा और जमतिहवा नाले के पास पाए गए जीवाश्म रूपी पत्थर दुनिया के प्राचीनतम चट्टानों में एक हैं जिसमें धरती के बहुत सारे रहस्य छुपे हुए हैं। वैज्ञानिकों ने दावा किया कि दुनिया के सबसे पुराने फासिल्स के लिए मशहूर सलखन से भी पुराने जीवाश्म रूपी पत्थर इस इलाके में मौजूद हैं। भू वैज्ञानिकों के दावे के अनुसार यहां के चट्टानों की उत्पत्ति 180 करोड़ वर्ष पूर्व महाकौशल नामक समुद्र में तलछटों के आरंभिक क्षैतिज जमाव के साथ हुई थी। यहां की स्लेटी रंग के चट्टानों में 180 करोड़ वर्ष से अब तक धरती में हुए संपूर्ण इतिहास के दुर्लभ प्रमाण संरक्षित हैं। चट्टानों की परतों में संरक्षित इतिहास मध्यप्रदेश के जबलपुर से लेकर सोनभद्र झारखंड सीमा के निकट तक फैले अंत:महाद्वीपीय समुद्र क्षेत्र की धरती में चार बार हुए बृहद उलट-पुलट का प्रमाण है। जिसके आधार पर समुद्र के तलछटों में हुए बार-बार विरूपणों से विराट ऊंचाई वाले किंतु संकरे महाकौशल पर्वत का निर्माण हुआ। लंबे समय तक हुए टूट-फुट के कारण पर्वत के अवशेष अब आसपास की छोटी पहाड़ियों की श्रृंखला के रूप में दिखाई पड़ते हैं। वैज्ञानिकों के दल ने स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों से मिलकर इलाके के संरक्षण को लेकर चिंता जताई थी। जिसे लेकर वन विभाग ने तत्परता दिखाते हुए मुर्धवा नाले में चिन्हित दुर्लभ चट्टानों के समीप रस्सी से बैरिकेडिंग करा मुख्यमार्ग के किनारे इन चट्टानों से संबंधित महत्व दर्शाने वाला बोर्ड लगा दिया। गुरुवार को राज्य मंत्री संजीव गोंड़ एवं दुद्धी विधायक रामदुलार गोंड़ ने बोर्ड का फीता काटकर उद्घाटन किया। इस मौके पर राज्य मंत्री ने कहा कि जनपद के इस इलाके में देश विदेश के वैज्ञानिकों द्वारा 180 करोड़ वर्ष पूर्व जीवाश्म पत्थर होने का दावा किया जा रहा है। इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने की हम सबकी जिम्मेदारी है। प्रभागीय वनाधिकारी मनमोहन मिश्रा ने कहा कि भू वैज्ञानिकों का दावे के अनुसार पूर्व में यह इलाका समुद्र से घिरा था। चार बार के उथल-पुथल में इस क्षेत्र में पर्वत पहाड़ों की रचना हुई। वैज्ञानिकों ने इन पत्थरों की उम्र 180 करोड़ वर्ष बताया है। वैज्ञानिक लगातार इस पर शोध कर रहे हैं। हमारे सभ्यता से जुड़े बहुत सारे रहस्य इन पत्थरों में छिपे हैं। जो गहन शोध के बाद ही पता चल पाएगा। इस मौके पर म्योरपुर ब्लाक प्रमुख मानसिंह गोंड़, मुर्धवा के पूर्व पंचायत सदस्य अजय राय,रेंजर धीरेन्द्र मिश्रा, मदनलाल अशोक सिंह सहित दर्जनों लोग मौजूद रहे।

पर्यटन का नया केंद्र बनकर उभरेगा यह इलाका

रेणुकूट। प्रभागीय वनाधिकारी मनमोहन मिश्रा ने कहा कि इस इलाके को ईको टूरिज्म से जोड़ा जाएगा। इन चट्टानों का शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने पत्थरों के संरक्षण की बात कही। जिसका दायित्व हमने स्वीकार किया है। यहां किसी भी प्रकार का खनन या अतिक्रमण नहीं करने दिया जाएगा। सलखन का फॉसिल्स 140 करोड़ वर्ष पुराना है जबकि यह 180 करोड़ वर्ष पुराना बताया जा रहा है। अमेरिका के येलो स्टोन से भी ज्यादा पुराना यहां के पत्थर बताए जा रहे हैं। सरकार इको टूरिज्म पर बहुत ध्यान दे रही है। इस इलाके को भी इको टूरिज्म से जोड़ा जाएगा। इसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। देश विदेश से पर्यटक सहित छात्र और वैज्ञानिक आएंगे। जिसका लाभ स्थानीय लोगों को मिलेगा।

पत्थरों के दावे पर उठाया सवाल

रेणुकूट। इलाके में 180 करोड़ वर्ष पुराने पत्थरों के मिलने के दावे से जहां भू वैज्ञानिकों सहित प्रशासनिक अमला उत्साहित है। इलाके का टूरिज्म विकास करने और धरती में छुपे रहस्य का पता लगाने के लिए शोध का दायरा बढ़ाया जा रहा है वहीं स्थानीय लोग इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं। लोगों का कहना है कि केवल मुर्धवा और जमतिहवा नाला के पास ही ऐसे पत्थर कैसे मिल सकते हैं। जब यह पूरा इलाका समुद्र से भरा था तो बड़े भूभाग पर शोध क्यों नहीं किया जा रहा है। लोगों ने बताया कि इस इलाके में ऐसे चट्टान बहुतायत मात्रा में हैं। अगर इसमें धरती की उत्पत्ति से जुड़े रहस्य हैं तो बड़े स्तर पर जांच करने की आवश्यकता है। आनन-फानन में किए जा रहे संरक्षण की कवायद से वन भूमि से सटे रहवासियों को वन विभाग द्वारा तमाम तरह से परेशान किए जाने की संभावना बढ़ जाएगी।

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